पर्यावरण और जीवन का दस गुना आँक बढ़ाने की कला सिखाते हैं - जम्भाणी साहित्य के नियम

 पर्यावरण और जीवन का दस गुना आँक बढ़ाने की कला सिखाते हैं - जम्भाणी साहित्य के नियम                                         

                                              डॉ. साधना गुप्ता              

                                


   साहित्य संस्कृति का वाहक होता है और संस्कृति हमें जीवन जीने का सही तरीका सिखाती है। सर्वे भवंतु सुखिनः, सर्वे संतु निरामया का संदेश देती है, जिसमें सर्वे का अर्थ मात्र मनुष्य से नहीं , जीव जंतु से भी नहीं, मात्र समस्त प्राणियों से भी नहीं, वरन्  संपूर्ण पर्यावरण, स्वास्थ्य नियामक पंच भूतों की निर्मलता से भी है। तभी प्राणी सुखी रह पाएंगे । जम्भाणी साहित्य    पर दृष्टि डालें तो जांभोजी द्वारा दिए गए 29 नियम जीवनयापन करने की एक ऐसी आचार संहिता है जो पूर्णतया वैज्ञानिक एवं  व्यावहारिक धरातल लिए हुए है। इनका पालन कर विश्व में पैर पसारे नशाखोरी, पर्यावरण प्रदूषण, आतंकवाद, हिंसा, भ्रष्टाचार कोरोना जैसी जानलेवा बीमारियों इत्यादि का समाधान खोजा जा सकता है। जीवन में इनके उपयोग द्वारा हम अपनी व अपने पर्यावरण का मान दस गुना कैसे बढ़ा सकते हैं? इसी के अनुसन्धान  का प्रयास हमारा यह आलेख है।


       बिश्नोई  पंथ के प्रसिद्ध कवि उदोजी ने इन्हें  इस प्रकार पद्यबद्ध  किया  है - 

तीस दिन सूतक, पांच ऋतुवन्ती न्यारो। सेरा  करो  स्नान,  शील,  संतोष,  शुची   प्यारो। 

 संध्या करो, सांझ आरती, गुण गावो। होम हित चित प्रीत द्विकालसूं होय, वास बैकुंठे पावै। 

पानी, बांणी, ईन्धणी,, दूध इतना लीजै छान। क्षमा, दया  ह्रदय  धरो,  गुरु  बतायो  जान। 

, निंदा, झूठ,बरजियों, वाद न करनो कोय। अमावस्या व्रत राखणों, भजन विष्णु बताओ जोय। 

जीव दयाचोरी पालनी, रुख लीला नहिं घावै। अजर जरै, जीवत मरै, वे वास वैकुंठा पावै। 

करे रसोई हाथ सूं, आन सूं पला न लावै। अमर रखावै थाट, बैल बधिया न करावै। 

अमल, तंबाखू, भांग, मद, मांस सू दूर ही भागै। लील न  लावै अंग, देखत दूर ही त्यागै। 

उणतीस धर्म की आखड़ी, हृरदै धारयो जोय, गुरु जाम्भोजी किरपा करी नाम विश्नोई होय।(1) 


तीस दिन का  सूतक और ऋतुवन्ती  न्यारो -  वैज्ञानिक एवं व्यावहारिक दोनों आधारों पर हम जानते हैं कि सन्तान के जन्म के बाद  माँ एवं रजस्वला महिला दोनों ही शारीरिक रूप से कमजोर हो जाती है। ऐसे समय में महिला को आराम की आवश्यकता होती है साथ ही कमजोरी की वजह से अन्य लोगों से संपर्क से बीमार होने की संभावना भी रहती है। हम यह भी जानते हैं कि महिलाओं के लिए कोई रविवारीय अवकाश का दिन नहीं होता। सरकारी कर्मचारी 7 घंटे काम करता है पर वह प्रतिदिन प्रातः 5:00 बजे से रात्रि 10:00 बजे तक अर्थात् 17 घंटे काम और 7 घंटे आराम करती है। ऐसे में उपरोक्त दोनों स्थिति में नारी के स्वास्थ्य को ध्यान में रखकर क्रमशः 30 दिवस व 5 दिवस उसे सभी कार्यों से अवकाश देकर नारी के स्वास्थ्य लाभ की बात की गई है। क्योंकि बालक को माता के दूध के रुप में पोष्टिक आहार भी तभी मिलेगा जब वह स्वयं स्वस्थ होगी। 


प्रातः स्नान - प्रातः काल स्नान अनेक दृष्टि से लाभकारी है। इससे आलस्य नष्ट होता है। शरीर नयी स्फूर्ति एवं ताजगी से युक्त होकर ऊर्जावान बनता है। दिनभर शरीर पर लगी गंदगी, पसीना सभी स्नान से साफ हो जाता है। रोम छिद्र खुल जाते हैं। रक्त संचार बढ़ता है जिससे मन प्रसन्न होता है तो तन भी स्वस्थ रहता है। आज जब वातावरण में प्रदूषण की मात्रा अत्यधिक बढ़ गई है तो इस नियम का महत्व स्वयं सिद्ध है। कोरोना के इस संकट काल में सभी को चेतावनी दी गई है कि जितनी बार घर से बाहर जाए, घर आकर स्नान करे। विश्नोई समाज में इस नियम का पालन दृढ़ता से करने से इन्हें स्नानी के नाम से भी संबोधित किया जाता है। चाहे आध्यात्मिक हो या वैज्ञानिक, सभी दृष्टि से यह महत्वपूर्ण एवं प्रासंगिक है। हमारे वेदों में तो ब्रह्म मुहूर्त में स्नान की बात बहुत पहले से ही कही गई है।


शील का पालन - मनुष्य को चरित्रवान होना चाहिए। चरित्र का नुकसान सभी कुछ का नुकसान माना गया है,- When wealth is lost, nothing is lost; when health is lost, something is lost; when character is lost, all is lost. चरित्रवान व्यक्ति विकास के रास्ते पर अग्रसर होकर समाज का सम्मान प्राप्त करता है। श्रेष्ठ मानवीय गुणों से संपन्न शीलवान व्यक्ति ही श्रेष्ठ समाज की संरचना करता है क्योंकि सद्गुणों की शुरुआत स्वयं से ही करनी होती है। जब तक स्वयं की ऊंगली पर   कुमकुम नहीं लगेगा ,आप दूसरे के ललाट   पर तिलक कैसे लगा सकते हैं? इसलिए जांभोजी ने शबदवाणी  में मानवीय गुणों का समर्थन किया और इन्हें अपने नियमों में शामिल किया। 


संतोष धारण करना- सांसारिक इच्छाएं अंतहीन है अतः जीवन में संतोष का होना अत्यावश्यक है। भारतीय धर्म ग्रंथों में इसीलिए त्याग के साथ भोग की बात कही गई है। आज मानव जिस मानसिक पीड़ा,  अकेलापन, सन्त्रास को झेल रहा है। पर्यावरण प्रदूषण की विकराल समस्या और कोरोना की विश्वव्यापी महामारी को झेल रहा है उसका कारण भी उसकी असीमित महत्वाकांक्षा ही है। अतः इन सब से संतोष के द्वारा ही मुक्ति मिल सकती है इसीलिए जांभोजी ने संतोष धारण करने पर जोर दिया। 


आंतरिक एवं बाह्य स्वच्छता- व्यक्ति के आचरण की पवित्रता के लिए आवश्यक है आंतरिक स्वच्छता, क्योंकि विचार ही महत्वपूर्ण होते हैं, वे दूर तक जाते हैं। दूर तक यात्रा करते हुए जीवन का अंग बनते हैं। व्यक्ति जैसा सोचता है वैसा ही कार्य करता है, आचरण करता है और जैसे उसके कर्म एवं आचरण होते हैं वैसा ही वह बन जाता है। समाज में वही उसकी पहचान बन जाती है। वस्तुतः हमारे कर्म तो हमारी आंतरिक विचार श्रृंखला का ही प्रतिबिंब होते हैं अतः जांभोजी ने आंतरिक व बाह्य स्वच्छता को आवश्यक माना और नियमों में शामिल किया। 


प्रातः सायं संध्या वंदन, संध्या आरती, हरि गुणगान एवं नित्य हवन- इस सृष्टि को संचालित करने वाली शक्ति हमें कठपुतली के समान नृत्य करवाती है। उसी शक्ति का स्मरण-आराधना करते हुए उसके प्रति अगाध विश्वास ही व्यक्ति को समस्त आधि-व्याधि से बचाने वाला है। हम प्रातः संध्या वंदन करके उसी शक्ति से अपनी आवश्यकता के अनुसार शक्ति प्राप्त करते हैं ठीक उसी प्रकार जैसे हम बैंक से धनराशि निकालते हैं। अतः जांभोजी प्रातः-संध्या दोनों समय संध्या वंदन के नियम की बात करते हैं। संध्या को आरती, हरि गुणगान की बात करते हैं जिससे व्यक्ति प्रत्येक कार्य परमात्मा की साक्षी में करे और गलत कार्य से बचा रहे। इन नियमों का पालन कर मनुष्य भौतिक एवं आध्यात्मिक दृष्टि से चिंता मुक्त हो सकता है। 


   आज विज्ञान सिद्ध कर चुका है कि हवन से निकला धुआं वायु को शुद्ध करता है। पर्यावरण को जीवन   दान देता है और हवन करने वाले व्यक्ति को स्वास्थ्य लाभ प्रदान करता है। अतः नित्य हवन कर हम स्वयं स्वास्थ्य लाभ प्राप्त करते हुए पर्यावरण को भी शुद्ध रखकर प्राणी मात्र का भला कर सकते हैं। होम की अग्नि से वातावरण में विद्यमान विभिन्न रोगों के कीटाणु नष्ट हो जाते हैं और समीप का वातावरण  सुगंध से सुवासित हो जाता है। सुगंध भला किसे अच्छी नहीं लगती? इस तरह नित्य का हवन आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक दोनों ही दृष्टि से महत्वपूर्ण है। संभवतः इसीलिए बिश्नोई पंथ ने इसकी अनिवार्यता हेतु प्रचलित किया कि- होम की ज्योति में ही गुरु जांभोजी के दर्शन होते हैं।  


पानी, वाणी, ईंधन एवं दूध छान कर प्रयोग करना- जल को छान कर पीने से जहाँ हम बिमारियों से बचते हैं वहीं अहिंसा का पालन भी करते हैं। विज्ञान भी शुद्ध जल पर सर्वाधिक महत्व देता है। इसी प्रकार शब्दों के बाण तलवार की धार से भी गहरे घाव करते हैं। महाभारत होते देर नहीं लगती। अतः वाणी का प्रयोग सोच विचार कर करना चाहिए। ईंधन में जीव हो सकते हैं, अतः उसे भी झटकार कर प्रयोग करना चाहिए। इसी प्रकार दूध में पशुओं के शरीर में चिपके जीवाणु व मिट्टी के कन हो सकते हैं इसीलिए जांभोजी इन सभी का प्रयोग छानकर करने की बात करते हैं। 


क्षमावान एवं दयालु बनें- क्षमा मनुष्य का सबसे बड़ा आभूषण है। कई बार इससे क्षमा प्राप्त व्यक्ति के जीवन की धारा ही बदल जाती है अतः व्यक्ति में क्षमा के संग दया की अपेक्षा भी की गई है क्योंकि दयावान ही क्षमा करने की सामर्थ्य रखता है, अन्य नहीं। 


चोरी, निंदा व झूठ न बोलें- मानव जीवन के विकास में बाधक चोरी एवं निंदा न करने की बात भी कही  है। चोरी व्यक्ति को पाप कर्म करने को उकसाती है। समाज में अव्यवस्था फैलती है और निंदा के मूल में ईर्ष्या और द्वेष की भावना कार्य करती है जो निंदक के व्यक्तित्व को समाप्त कर देती है। 


   हम जानते हैं सच को तप और झूठ को पाप कहा गया है। यदि व्यक्ति झूठ नहीं बोलता है तो अनेक बुराइयों से बच जाता है। उज्ज्वल चरित्र, विशिष्ट व्यक्तित्व का धनी व समाज में सम्मान व प्रतिष्ठा प्राप्त करता है। अतः झूठ नहीं बोलने को नियम में स्थान दिया।  


वाद विवाद ना करें-  वाद-विवाद के मूल में अज्ञानता व अहंकार होने से विषय से भटक कर व्यक्ति समय व शक्ति को व्यर्थ नष्ट करने के संग शत्रुता भी मोल ले लेता है जो व्यक्ति व समाज के विनाश का कारण बनती है। अतः जांभोजी ने  वाद-विवाद ना करने का नियम बनाया।  


अमावस्या का व्रत- बिश्नोई समाज में अमावस्या का दिन पवित्र माना गया है अतः बच्चे व रोगियों के अतिरिक्त सभी के लिए अमावस्या व्रत का नियम बनाया गया है। जिससे व्यक्ति अपना समय विष्णु भजन, परोपकार, दान, हवन इत्यादि में व्यतीत करे। व्रत का महत्व धार्मिक व स्वास्थ्य दोनों ही दृष्टि से महत्वपूर्ण है। साथ ही देश की खाद्यान्न की समस्या को सुलझाने में भी सहायक है।स्मरणीय है द्वितीय प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने देश की खाद्यान्न समस्या को हल करने के लिए देशवासियों से ऐसा करने की अपील की थी जिसे देशवासियों ने सहर्ष स्वीकार किया था। 29 दिनों के बाद एक दिन का विश्राम भोजन तंत्र को भी फायदा देता है। 


विष्णु का जप- ध्वनि व शब्द का प्रभाव विज्ञान स्वीकार करता है। यह वक्ता-श्रोता दोनों पर पड़ता है। नाम जप की महिमा से हमारा वांड्मय भरा पड़ा है। अतः जांभोजी ने विष्णु के नाम जप को महत्व देते हुए अपने नियमों में शामिल किया। 


प्राणी मात्र पर दया- जीवों की रक्षा हेतु दया भाव आवश्यक है। इसके अभाव में आज पृथ्वी से अनेक जीवों का लोप हो गया है और पारिस्थितिकी तंत्र के गड़बड़ा जाने से पर्यावरण और मानव जीवन दोनों खतरे में आ गए हैं। ऑक्सीजन की कमी से चटपट लाशों के ढेर आज हमारे समाज की कड़वी सच्चाई बने हुए हैं। अतः प्राणी मात्र की, पर्यावरण की सुरक्षा हेतु बिश्नोई पंथ के लोगों के लिए जीव दया पालनी का नियम बनाया गया जो आज सभी के लिए अनुकरणीय है। 


हरा वृक्ष न काटें- पर्यावरण संरक्षण के लिए मानव, मानवेतर प्राणियों एवं वनस्पति जगत में संतुलन रहना अत्यावश्यक है। अतः हरा वृक्ष न काटने का नियम बनाया गया। वृक्ष भी प्राणवान हैं अतः वृक्ष न काटने की आज्ञा के संग उन्होंने स्थान-स्थान पर वृक्षारोपण करके लोगों में वृक्ष प्रेम की भावना जागृत की। आज तो इसका महत्व और अधिक बढ़ जाता है। 


काम, क्रोध, लोभ, मद और मोह को वश में रखें- जीवन पथ पर आगे बढ़ने के लिए इन पांचों पर नियंत्रण रखने की बात की। अन्यथा व्यक्ति का जीवन नष्ट हो जाता है। 


रसोई अपने हाथ से बनावें- जैसा अन्न वैसा मन, जैसी भावना से भोजन बना होता है वह वैसा ही असर करता है। भोजन की पवित्रता, स्वच्छता और संस्कारशीलता के लिए स्वयं भोजन बनाने पर जोर दिया। 


थाट को अमर रखना- थाट के रूप में बकरों के रहने की जगह की व्यवस्था की बात की, ताकि उनकी हत्या न की जा सके। थाट में रहने वाले बकरों के चारे-पानी की व्यवस्था समाज द्वारा की जाती थी और उन्हें कोई मार नहीं सकता था। वे अपनी मौत आने पर ही मरते थे। 


बेल बधिया न करावे- कृषि कार्य हेतु बछड़े को बेल बनाने के लिए उसे नपुंसक करना होता था जिसका परम्परागत तरीका बड़ा पीड़ादायक होता था।अतः उन्होंने इसे भी बंद करवाया। 


अमल, तंबाकू, भांग, मांस, मदिरा का प्रयोग ना करें- यह सभी हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हैं साथ ही ये हमें आर्थिक दृष्टि से कमजोर बना कर अपराध की ओर उन्मुख करते हैं। इसलिए इन्हें नियमों में शामिल किया और शाखाहार अन्न, फल, दूध, दही, घी आदि का प्रयोग कर स्वस्थ, दीर्घायु हेतु आचार- विचार को पवित्र रखने का संदेश दिया। 


नील व नीले वस्त्रों का प्रयोग न करें- जिस स्थान पर, जिस जमीन पर नील की खेती होती है वह बंजर हो जाती है जिससे पर्यावरण का नुकसान करने के कारण इसे त्यागने  की बात की। नीला रंग विलासिता का प्रतीक है। यह सूर्य के ताप को ग्रहण कर अनेक रोगों को जन्म देता है अतः मानव व पर्यावरण की सुरक्षा हेतु इसके प्रयोग की भी मनाही की।  


   इस तरह से उपरोक्त उल्लेखित 29 नियमों के विवेचन से स्वतः स्पष्ट हो जाता है कि जीव मात्र की रक्षा के लिए ही नहीं, अपितु पर्यावरण एवं पंच महाभूतों की सुरक्षा के लिए पृथ्वी पर मानव का जैसा आचरण होना चाहिए, जिससे उसके जीवन के अंतिम लक्ष्य की पूर्ति होती है, उन सब बातों को 29 नियमों   रूपी कर्तव्यों की डोर में बांधकर आस्था का संबल प्रदान करते हुए जांभाणी साहित्य में गूंथ दिया गया है जो हमें संदेश देता है- संपूर्ण पर्यावरण की सुरक्षा में ही मानव का हित निहित है, अन्यथा एक सूक्ष्मदर्शी जीव कोरोना ने दुनिया को निष्क्रिय कर दिया, मानव जीवन को समाप्त कर दिया, मानव को उसकी औकात दिखा दी। ईश्वर ने मानव को सबसे ज्यादा सुंदर व प्रतिभा संपन्न बनाया है तो वह उस ईश्वर के अस्तित्व को ना भूले। पर्यावरण को विश्रंखलित ना करे और जीवन में अपना व्यक्तित्व शून्य के समान रखे, जिससे कोई उसमें कुछ घटा न सके, परंतु जिसके साथ वह खड़े हो जाए उसकी कीमत दस गुना बढ़ जाये

Comments

Popular posts from this blog

हिंदी गद्य के उन्नायक राजा लक्ष्मण सिंह

साहित्यिक हिंदी के रूप में खड़ी बोली हिंदी का उदय तथा विकास

लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक और गीता रहस्य