खाद्य प्रसंस्करण बनाम फूड प्रोसेसिंग
खाद्य प्रसंस्करण बनाम फूड प्रोसेसिंग
डॉ. साधना गुप्ता'
लंबी अवधि तक खाद्य पदार्थों को संरक्षित रखने हेतु प्रसंस्करण कर नवीन रूप में प्रस्तुतीकरण खाद्य प्रसंस्करण (फूड प्रोसेसिंग) कहलाता है । इसके माध्यम से भिन्न - भिन्न प्रकार की फसलों से उत्पाद तैयार किए जाते हैं । फल, सब्जी, दूध के अतिरिक्त मसाले ,मांस ,मछली उद्योग, वृक्षारोपण व अनाज से बनी खाद्य सामग्री यथा - अचार, मुरब्बे ,गुलकंद, दलिया ,बढ़ियाँ, पापड़, चिप्स, बिस्कुट ,नमकीन, मिठाई इत्यादि के निर्माण सङ्ग ग्रेडिंग, पैकेजिंग और छटनी भी इसी के अंतर्गत समाहित है ।
आवश्यकता :- वर्तमान समय में नौकरी के लिए पति - पत्नी की भागती दौड़ती जिंदगी में घर सेऑफिस की लंबी दूरी तय करने के संग परेशानियों में शांति से प्रतिदिन भोजन बनाने एवं खाने के लिए वक्त ही कहां बच पाता है ? परिणाम स्वरूप उसके हल रूप में "रेडी टू ईट पैक्ड फूड" का चलन प्रारंभ हुआ और वैश्विक स्तर पर प्रोसैस्ड फूड इंडस्ट्री का व्यवसाय फलने फूलने लगा । प्रति व्यक्त आय में वृद्धि के कारण तेजी से बढ़ती लाइफ़ स्टाइल, बच्चों का शिक्षा प्राप्ति हेतु परिवार से दूर रहना इत्यादि कुछ ऐसे कारण हैं जिनके रहते उच्च गुणवत्तापूर्ण खाद्य पदार्थों पर खर्च करना व्यक्ति की जरूरत बन गई है, वहीं कृषि व बागवानी उत्पादों की बर्बादी को रोकने, उनकी उपभोक्ता अवधि बढ़ाने, उत्पादों का मूल्यवर्धन करने ,किसानों की आमदनी बढ़ाने , लोगों को आत्मनिर्भर बना बेरोजगारी कम करने में इसकी महत्वपूर्ण भूमिका है। सवा करोड़ की आबादी वाले हमारे देश में लगभग तीस करोड़ उपभोक्ता एक मजबूत घरेलू बाजार का निर्माण करते हैं । उत्पादन, वृद्धि, खपत और निर्यात में भारत का खाद्य प्रसंस्करण विश्व में सबसे बड़ा है क्योंकि भारत फल व सब्जी( केला, आम, मूंगफली, काजू, दाल, चावल ,आलू इत्यादि) का प्रमुख उत्पादक देश है(विश्व के सब्जी उत्पादन का 17% , फल उत्पादन का 14% ) ,वहीं दूध उत्पादन पर भी प्रथम पायदान पर है ।
महत्त्व : - ऐसे में खाद्य सामग्री की विविधता बढ़ा पोषकता में वृद्धि कर उसे बनाए रखने एवं उसका जीवन काल बढ़ाने, किसानों का अतिरिक्त लाभ सुनिश्चित करने ,नई आर्थिक क्रियाओं यथा,- रोजगार ,निर्यात ,आयात को बढ़ावा देने में सहायक है।
बाधाएं :- बुनियादी संरचना में कमी, सीमांत कृषकों की बहुतायत, एकल नीति एवं कुशल श्रम का अभाव, शोध - अनुसंधान, विपणन, ब्रांडेड की कमी, जीवन शैली में खाद्य प्रचलन कम होना, व्यापार की तकनीकी बाधा, जैविक उत्पाद की बढ़ती मांग, गुणवत्ता जांच निर्धारण एवं नियामक तत्व की कमी, धार्मिक - सांस्कृतिक मान्यताएं इत्यादि कारण खाद्य प्रसंस्करण के बाधक रहे हैं।
सरकारी प्रयास :- उपरोक्त बाधाओं के निस्तारण के लिए खाद्य प्रसंस्करण को कृषि प्रक्रिया में शामिल कर सन 2014 - 15 के बजट में कृषि प्रसंस्करण इकाइयों को सस्ता ऋण उपलब्ध करवाने हेतु 200 करोड रुपए का विशेष नाबार्ड कोष बनाया गया। कौशल विकास मंत्रालय की स्थापना की गई और हजारों लोगों के प्रशिक्षण का लक्ष्य रखा गया।यहां विशेष तथ्य यह है कि प्रतिभाओं को तराशने हेतु यह प्रशिक्षण निशुल्क दिया जाता है और इस प्रशिक्षण का प्रमाण पत्र अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्य है , इससे युवा उद्योग संबंधी विकास कर स्वावलंबी बन सकेंगे । निवेशकों की मदद के लिए इन्वेस्टर्स पोर्टल तैयार किया गया है। खाद्य प्रसंस्करण पर एक्साइज ड्यूटी नहीं है ।उभरते हुए उद्योगपतियों के लिए जमीन तैयार करने हेतु मेगा फूड पार्को को मंजूरी दी गई है । कृषि विज्ञान केंद्र को डिजिटल कर दिया गया, जिससे घर बैठे कृषक अपनी समस्याओं का समाधान कर सके और एकीकृत कोल्ड चेन की स्थापना की गई है जिससे खाद्य पदार्थों की बर्बादी रोकने और उनके मूल्यवर्धन में मदद मिलेगी । मुद्रा योजना ,स्टार्टअप इंडिया , ग्रामीणक्षेत्र में महिला प्रशिक्षण , कर प्रक्रिया का सरलीकरण इत्यादि जैविक कृषि को बढ़ावा देने वाली योजनाओं इत्यादि कुछ चुनौतियां खाद्य प्रसंस्करण के समक्ष मौजूद हैं तथापि 2016 के बाद पिछले पांच वर्षों में हुई 9% की दर से वृद्धि निवेश के लिए अच्छी संभावनाओं की ओर संकेत करती है । आवश्यकता है इससे जुड़े उद्यमी नवाचार को अपनाए , कृषि विज्ञान केंद्र , कृषि विश्वविद्यालय से जुडें , कच्चे माल से छोटे स्तर पर आत्मविश्वास और पूर्ण उत्साह से अपने कार्य की शुरुआत करें ।को प्रारंभ किया गया है।
उद्देश्य :- कृषि को पूरक बनाने के उद्देश्य से प्रारम्भ की गई इस योजना से संसाधनों का आधुनिकीकरण कर कृषि उत्पादों के नुकसान को कम कर रोजगार के अवसरों का सृजन किया गया है । निश्चित ही इन प्रयासों से जहां एक ओर इन वस्तुओं का आयात बंद होगा ,राष्ट्रीय आय में वृद्धि होगी वहीं फसल कटाई से लेकर लोडिंग , कोल्ड स्टोरेज, पैकेजिंग ,विपणन ब्रांडिंग में व्यापक रोजगार के अवसर ग्रामीण महिलाओं को , कृषको को मिलेंगे । छोटे व्यापारियों की आय बढ़ाने में मददगार होंगें जिससे कृषि व उद्योग के मध्य सामंजस्य स्थापित करने में मदद मिलेगी । कृषि उत्पादकता में वृद्धि से कृषकों की आय में बढ़ोतरी के संग निर्यात से विदेशी मुद्रा की प्राप्ति होगी ।
चुनौतियां :- यद्यपि आज भी शीतभंडार , वेयर हाउस की अपर्याप्तता , प्रयोगशालाओं की कमी , केंद्र राज्य स्तरीय कानून में एकरूपता व सामंजस्य का अभाव , जनता का प्राकृतिक खाद्य उत्पादों में रुचि इत्यादि कुछ चुनौतियां खाद्य प्रसंस्करण के समक्ष मौजूद हैं तथापि 2016 के बाद पिछले पांच वर्षों में हुई 9% की दर से वृद्धि निवेश के लिए अच्छी संभावनाओं की ओर संकेत करती है ।
आवश्यकता है इससे जुड़े उद्यमी नवाचार को अपनाए , कृषि विज्ञान केंद्र , कृषि विश्वविद्यालय से जुडें , कच्चे माल से छोटे स्तर पर आत्मविश्वास और पूर्ण उत्साह से अपने कार्य की शुरुआत करें ।
Comments
Post a Comment