शोध और नैतिक मूल्य
शोध और नैतिक मूल्य
डॉ. साधना गुप्ता
जिओ और जीने दो की भावना रखते हुए कार्य करना, सदैव दूसरों के हित का ध्यान रखते हुए कार्य करने जी भावना नैतिक मूल्यों की आधार शिला है।जब से नौकरी प्राप्त कर धन अर्जन करना शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य रह गया तब से उच्च शिक्षा ,यहां तक कि शोध तक में इन्हें तिलांजलि दे दी गई। अतः प्रश्न है इन्हें पुनः कैसे शोध में सम्मिलित किया जाए? परंतु इसके पहले जानना होगा शोध का उद्देश्य क्या है ?
शोध का उद्देश्य :- वस्तुतः शोधार्थी के शोध का उद्देश्य स्वयं को , देश को ,यहां तक की संपूर्ण मानवता को एक नई दिशा, नई पहचान देना होता है, जिसकी पूर्णता तभी संभव है जब उसमें नैतिक मूल्य के रूप में लोककल्याण को सम्मिलित किया जाए ।"कहीं की ईंट, कहीं का रोड़ा, भानुमति ने कुनबा जोड़ा "से कोई शोध शोध नहीं होता। शोधार्थी का विषय चाहे जो हो उसका शोध स्वयं के नैतिक मूल्यों का प्रतिबिंब होता है। नैतिक मूल्यों की अहम भूमिका ही उसे समाजोपयोगी और लोक कल्याणकारी बनाती है ,जिसे सीधे- सीधे इस रूप में समझ सकते हैं ,-जब कभी अनैतिक मूल्यों वाले व्यक्ति आतंक के लिए शोध करते हैं या उनके शोध का दुरुपयोग करते हैं तो उससे विध्वंस ही होता है । परमाणु विखंडन की शोध का दुष्परिणाम परमाणु बम के रूप में प्रत्यक्ष है, स्मार्ट फोन का आविष्कार और गलत प्रयोग युवा पीढ़ी को अंधकार की कारा में धकेल कर नैतिक मूल्यों की बर्बादी के लिए उत्तरदायी है क्योंकि यह उन्मुक्त भोग को आमंत्रण दे महिलाओं के यौन शोषण का कारण बन रहा है।
शोध में नैतिक मूल्यों की आवश्यकता :- आज आवश्यकता है प्राथमिक स्तर से इन्हें शिक्षा में सम्मिलित कर शोध तक अनिवार्य रूप में पालन किया जाए ,क्योंकि गंदी स्लेट पर सुंदर अक्षर कदापि अंकित नहीं हो सकते अतः मात्र शोध के समय शोधार्थी में नैतिक मूल्यों की अपेक्षा करना व्यर्थ होगा। यह संस्कार उसे बचपन से ही देने होंगे ।क्योंकि नैतिकता दायित्व बोध का ही दूसरा नाम है और हम जानते हैं दायित्व बोध "बंदर कूद "से संभव नहीं ।नैतिकता से पूर्ण ,भविष्य के हितार्थ होने पर ही शोध सच्चे अर्थ में अपनी सार्थकता सिद्ध कर सकेंगे। जनहितकारी, लोक कल्याणकारी हो सकेंगे और विश्व शांति में सहायक बन सकेंगे ।
शोध में नैतिकता हेतु आवश्यक शर्ते-
शोधार्थी का व्यक्तित्व :- शोध में नैतिक मूल्यों की स्थापना के लिए आवश्यक है शोधार्थी नैतिक मूल्यों से युक्त व्यक्तित्व के धनी हो।तभी उनके द्वारा किए गए शोध विश्व को नवयुग तक ले जाने में सक्षम होंगे। विश्व संस्कृति को विध्वंस से बचाने की नीति से युक्त, स्वच्छ व स्वस्थ मानसिकता वाले होंगे। अनैतिक मूल्यों वाले व्यक्ति तो आतंक के लिए शोध करते हैं जिनका परिणाम विध्वंस के अतिरिक्त कुछ हो ही नहीं सकता।
आचार्य व शोधार्थी के संबंध :- सर्व प्रथम तो आचार्य का व्यक्तित्व भी नैतिक मूल्यों से युक्त होना चाहिए।आज आचार्य शोधार्थी के मध्य नैतिक मूल्य- "अभिवादन-आशीर्वाद"का भी अभाव परिलक्षित हो रहा है ।कहीं इन संबंधों पर राजनीतिक विचारधारा हावी है तो कहीं अश्लील संबंधों की बू आती है। अतः जब तक शिक्षक निजी राजनीतिक विचारधारा त्यागकर शोधार्थी को निष्पक्ष और पारदर्शी रूप से, एक समान आत्मीय भाव से ,निस्वार्थ रूप से, मर्यादित आचरण से, समभाव से, शांत माहौल में शिक्षा प्रदान नहीं करता। सहजता से सत ज्ञान देकर उन्हें शोध की ओर प्रेरित नहीं करता तब तक वह समक्ष उपस्थित शोधार्थी से सम्मान की अपेक्षा भी कैसे कर सकता है? पहल शिक्षक को करनी होगी। नैतिक मूल्यों के माध्यम से ही इन संबंधों को मधुर बनाया जा सकता है ।तब सहज रूप में ना सही बाध्यता से ही सही विद्यार्थी भी वैसा आचरण करेंगे, उनका शिक्षक पर विश्वास होगा। वैसे तो यह प्रयास दोनों ओर से होना चाहिए ।उन्हें समझना होगा वह अपनी प्रतिभा से शोध द्वारा विश्व शांति का, प्रगति का मार्ग प्रशस्त करने आए हैं,उनका लक्ष्य स्वयं का ,अपने राष्ट्र का नाम विश्व मंच पर प्रतिष्ठित करना है ।
परिवेश में नैतिक मूल्य :- वर्तमान में कुछ विश्वविद्यालयों में पूर्ण लगन व मेहनत से मर्यादित परिवेश में शोध कार्य हो रहे हैं परंतु अधिकांश महाविद्यालयों में ब्लैक बोर्ड साफ, वॉशरूम की दीवारें बेहद भद्दे ,अमर्यादित शब्दों, गुटके पान मसालों की गंदगी से भरी पड़ी है।शोध के लिए आवश्यक पुस्तकालय, वाचनालय, प्रयोगशाला ,चर्चा व संगोष्ठी कक्ष का अभाव है ।कॉलेज कैंटीन में अश्लील चर्चाओं का बाजार गर्म रहता है।धरने -नारे, मारा- पीटी आम बात हो गई है। छात्रसंघ चुनाव के रूप में राजनीति के प्रत्यक्ष प्रवेश ने चारित्रिक पतन को भयावह रूप दे दिया है। आरक्षण के नाम पर जातिवाद, सांप्रदायिकता, वैमनस्य बढ़ रहा है। नैतिक मूल्यों की इस गिरावट को स्वच्छ व स्वस्थ मानसिक परिवेश के निर्माण द्वारा ही दिशा दी जा सकती है अतः शिक्षक शोधार्थी को सकारात्मक पहल करनी होगी क्योंकि स्वस्थ वातावरण में ही गुणवत्तापूर्ण शोध संभव है।
शोधार्थी के नैतिक कर्तव्य :-
सूचित स्वीकृति :- शोधार्थी अपने शोध के लिए आंकड़े एकत्रित करते समय आंकड़े देने वाले को अपने शोध का उद्देश्य बताएं और प्राप्त आंकड़ों का अपने शोध में प्रयोग करने की स्वीकृति ले।
विश्वसनीयता :- शोधार्थी सूचना प्रदाता की विश्वसनीयता बनाए रखने हेतु अपने शोध में उसका सही नाम प्रयोग ना करें ,जिससे सूचना दाता को किसी भी प्रकार से मानसिक कष्ट या अन्य हानि ना पहुंचे।
वैज्ञानिक समर्थन :- शोध मूल्य निरपेक्ष हो ।अति संवेदनशील वर्गों का बचाव हो।
ईमानदारी :- शोध हेतु सामग्री जहां से ली गई है उसका स्पष्ट उल्लेख करें। केवल नकल भरोसे डिग्री लेना शोध नहीं है ,इससे न योग्यता सिद्ध होती है ना ज्ञान।
वस्तुनिष्ठता :- अपने शोध में किसी भी प्रकार के पक्षपात से बचे। शोध प्रमाण पुष्ट हो।
सतर्कता एवं खुलापन :- समस्त शोध कार्य का पूर्ण रिकॉर्ड रखें ।अपने शोध को छिपाए नहीं वरन सांझा करें।
बौद्धिक संपदा का सम्मान :- यदि अपने शोध में दूसरे विद्वानों के आंकड़ों का प्रकाशन करे तो उससे स्वीकृति अवश्य ले।
अखंडता :- शोध में अपने अनुबंधों का पूर्ण पालन करें।
प्रायोजित शोध :- शोध को प्रायोजित करें तो किस ने प्रायोजित करवाया है, उसका पता नहीं चलना चाहिए। उससे किसी का अहित नहीं होना चाहिए।
अनुभवी परामर्श :- अपने शोध संबंधी अनुभवी परामर्श का आदर करें। यथा संभव उसे शोध में स्थान दे।
शोध के उद्देश्य हेतु उपचार को स्थगित करना :- जब तक शोध के सही निष्कर्ष प्राप्त ना हो जाए ,कुछ नवीन सामने ना आए ,गहन अध्ययन एवं विवेक का प्रयोग करते हुए पुनः पुनः प्रयत्न करें और वांछित परिणाम प्राप्त होने पर ही शोध को पूर्ण करे।
सामाजिक उत्तरदायित्व :- अपने शोध द्वारा सामाजिक उत्तरदायित्व का पालन करते हुए समाज की बुराइयों को दूर करने का प्रयास करें।
उत्तरदायी प्रकाशन :- शोध का उद्देश्य प्राणी मात्र का हित संवर्धन होता है अतः अपने ज्ञान के प्रचारार्थ शोध का प्रकाशन अनिवार्य रूप से करना चाहिए।
हम कहना चाहेंगे,- आधुनिक परिवेश में जीवन मूल्यों की पुनर्स्थापना हेतु उच्च शिक्षा में शोध में नैतिक मूल्यों के प्रयोग की परम आवश्यकता है ।क्योंकि शोध का उद्देश्य स्वयं के तथा समाज के जीवनानुभवों के आधार पर लोकहित हेतु जन कल्याणकारी निष्कर्ष प्रस्तुत करना होता है ,विश्व को नवीन तकनीक व आविष्कारों की सौगात देना होता है अतः देश को सशक्त बनाने, उन्नत करने, विकास की ओर अग्रसर करने, संस्कारी बनाने हेतु शोध के क्षेत्र में नैतिक मूल्यों का अत्यधिक योगदान है।
सार रूप में आज समाज को केवल साक्षर विद्यार्थियों की नहीं वरन जुझारू शोधार्थियों की आवश्यकता है, जिससे विश्व को पुनः मानवीय मूल्यों का पाठ पढ़ाया जा सके ।इंसान को इंसान बनाने वाले शोध के लिए प्रेरित करने के लिए शिक्षक -शोधार्थी के नैतिक स्तर की श्रेष्ठता ,परिवेशगत नैतिकता के संग शोधार्थी की तीव्र ग्रहण क्षमता, जिज्ञासु प्रवृत्ति ,जुझारू क्षमता पर ही महान शोध निर्भर करता है ।आज आवश्यकता है सामयिक
जीवन की आवश्यकतानुसार पूर्व शोध के आधार पर हम अपनी समस्याओं के हल नवीन शोध से प्राप्त करें और संपूर्ण विश्व के चेहरे पर मुस्कान बिखेर सकें।
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