जैविक खेती

 

              जैविक  खेती 

                                                                 .                                                डॉ. साधना गुप्ता

                


   जब कृषि कार्य में मृदा व पर्यावरण प्रदूषण पर नियंत्रण रखने, भूमि की उपजाऊ शक्ति को बनाए रखने, दीर्घकालीन व स्थिर उपज प्राप्त करने के लिए रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों का प्रयोग ना कर फसल चक्र, हरी खाद, जीवांशयुक्त खाद (कंपोस्ट) इत्यादि का प्रयोग किया जाता है, तो उसे जैविक खेती या कार्बनिक खेती (ऑर्गेनिक फार्मिंग) कहा जाता है। जैविक खेती से प्रकृति प्रदत्त पारिस्थितिकी तंत्र अबाध गति से चलता रहता है। अर्थात् जैविक एवं अजैविक पदार्थों के बीच आदान-प्रदान का चक्र निरंतर गतिशील रहता है। भूमि, जल, वायु तथा वातावरण प्रदूषित नहीं होते और मनुष्य ही नहीं अन्य जीवधारी भी स्वस्थ रहते हैं। 


भारत में जैविक खेती की आवश्यकता :- भारत एक कृषि प्रधान देश है। जिसकी मूलभूत आवश्यकता - "खाद्यान्न" कृषि पर निर्भर है, क्योंकि यहां का मुख्य भोजन शाकाहार है। साथ ही यहाँ की ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार भी कृषि ही है क्योंकि किसानों की आय का साधन कृषि है। इस दृष्टि से जैविक कृषि से मानव के स्वास्थ्य एवं संपन्नता का गहरा संबंध स्थापित हो जाता है। साथ ही इस पद्धति से खेती करने से तुलनात्मक रूप से मानव शरीर अधिक स्वस्थ रहता है। उसकी औसत आयु में वृद्धि होती है और अगली पीढ़ी भी पुष्ट पैदा  होती है। इसकी सफलता हेतु पूर्व में कृषि के संग गोपालन की व्यवस्था थी, परंतु शनै - शनै वह व्यवस्था छिन्न-भिन्न हो गई। रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग किया जाने लगा। परंतु रासायनिक उर्वरकों के दोष सामने आने के पश्चात सन 1990 के बाद जैविक उत्पादों के बाजार में बढ़ोतरी हुई और सभी का ध्यान पुनः जैविक खेती की ओर गया। 


उपयोगिता :- जैविक खेती करने से रासायनिक खाद पर निर्भरता कम होने से उपज की लागत में कमी आती है, वहीं भूमि की उपजाऊ क्षमता में वृद्धि से सिंचाई अंतराल में भी वृद्धि होती है। यहां तक कि फसलों की उत्पादकता में भी वृद्धि होती है । और तो और बाजार में जैविक पदार्थों की मांग बढ़ने से किसानों की आय में भी वृद्धि होती है। 


   मिट्टी की दृष्टि से आकलन करें तो एक और जहां भूमि की गुणवत्ता में सुधार आता है वहीं दूसरी ओर भूमि से जल का वाष्पीकरण कम होने से भूमि की जल धारण क्षमता में वृद्धि भी होती है। पर्यावरण की दृष्टि से भी जैविक कृषि लाभदायक है क्योंकि भूमि के जलस्तर में वृद्धि से तापमान में अपेक्षाकृत कमी और वातावरण में नमी रहती है जिससे मिट्टी, खाद्य पदार्थ और भूमि में पानी के माध्यम से होने वाले प्रदूषण में कमी आती है। कचरे का उपयोग खाद बनाने में होने से बीमारियों में भी कमी आती है। 


   अंतर्राष्ट्रीय बाजार की स्पर्धा में जैविक उत्पाद की गुणवत्ता के खरे उतरने से उसकी मांग सामान्य उत्पाद की अपेक्षा अधिक होती है, जिससे कृषक अधिक लाभ प्राप्त कर लाभान्वित हो सकते हैं। 


महत्व :- आज मानव जीवन के सर्वागीण विकास के लिए नितांत आवश्यक है कि प्राकृतिक संसाधन प्रदूषित न हों। वातावरण शुद्ध रहे एवं पौष्टिक आहार मिले। अतः आवश्यक हो जाता है हम खेती की जैविक पद्धति को अपनाएं। इसके माध्यम से हम अपने नैसर्गिक संसाधनों का उपयोग कर मानवीय पर्यावरण को प्रदूषित किए बिना संपूर्ण जनमानस के लिए खाद्य सामग्री उत्पन्न कर सकते हैं, क्योंकि बदलते ऋतु चक्र के अनुसार यहां सभी प्रकार की उपज प्राप्त करना संभव है। आज संपूर्ण विश्व में जैविक उत्पाद की मांग बढ़ रही है परंतु उस अनुपात में भारत में जैविक खेती में वृद्धि नहीं होने से देश का निर्यात प्रभावित हो रहा है। 


सरकारी प्रयास :- भारत सरकार ने जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए दसवीं पंचवर्षीय योजना में नेशनल सेंटर आफ ऑर्गेनिक फार्मिंग बनाकर जैविक नेशनल प्रोजेक्ट ऑन ऑर्गेनिक का एक पायलट प्रोजेक्ट तैयार कर कार्य प्रारंभ किया था  वह निरंतर गतिशील है। इसके तहत गाजियाबाद (नागपुर) में नेशनल सेंटर ऑफ ऑर्गेनिक फार्मिंग की स्थापना करने के साथ ही बेंगलूर, भुवनेश्वर, पंचकूला, इम्फाल और जबलपुर में जैविक खेती के लिए सेंटर खोले गए हैं। इस राष्ट्रीय  कार्यक्रम में जैविक प्रमाणीकरण कार्यक्रम, जैविक उत्पादन के लिए मानदंड और जैविक खेती को बढ़ावा देना शामिल है, परंतु देश में अभी 5.71 मिलियन हेक्टेयर में  ही जैविक खेती की जा रही है। इस  दृष्टि से विश्व में देश पन्द्रहवें स्थान पर है।  इस दृष्टि से हमें प्रथम पजयदान पर आना है ।हम इस और कफम बढ़ा रहे हैं। इसका प्रमाण है -"सिक्किम'। यह भारत का प्रथम राज्य है जो प्रमाणिक रूप से शत प्रतिशत जैविक राज्य बन गया है। यहाँ 75 हजार हेक्टेयर की कुल कृषिभूमि को प्रमाणिक तौर पर जैविक कृषि क्षेत्र में परिवर्तित कर दिया गया है । 

                                                                 .                                                 

                                                  


   

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