साहित्यकार : महावीर प्रसाद द्विवेदी
साहित्यकार : महावीर प्रसाद द्विवेदी
डॉ. साधना गुप्ता
द्विवेदी युग का नामकरण महिमा मण्डित व्यक्तित्व के धनी व्यक्ति आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी के नाम पर किया गया है। इन्होंने सरस्वती पत्रिका के सम्पादक के रूप में हिंदी की जो सेवा की उससे हिंदी साहित्य की दिशा व दशा दिनों में बदलाव आया।
जन्म व प्रयाण - महावीर प्रसाद द्विवेदी का जन्म 1864 ई. में हुआ था और मृत्यु 1938 में ।
सरस्वती के सम्पादक - बीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक चरण का विश्वकोश कहलाने वाली सरस्वती पत्रिका का प्रकाशन सन 1900 में नागरी प्रचारिणी सभा की प्रेरणा से इंडियन प्रेस प्रयाग द्वारा किया गया था। द्विवेदी जी 1903 से 1920 तक इसके संपादक रहे। सरस्वती के संपादक रहते हुए महावीर प्रसाद द्विवेदी महत्वपूर्ण कार्य किए। यद्यपि इसके पूर्व ये रेल विभाग में नोकरी करते थे परन्तु पत्रिका के सम्पादन बनने के बाद उनका एक अलग ही रूप उभर कर सामने ।
इस पत्रिका के माध्यम से द्विवेदी ने लेखको को नायिका भेद विषय को छोड़ विविध विषयों पर कविता लेखन के लिए प्रेरित किया।
काव्य की भाषा के रूप में ब्रज के स्थान पर खड़ी बोली का प्रयोग करने को प्रेरित किया जिससे गद्य और पद्य की भाषा एक ही हो सके।
सरल शुद्ध भाषा पर जोर दिया जिससे काव्य में निरसता आयी परन्तु भाषा शुद्ध हुई ।
तद्भव शब्दों के पक्षपाती महावीर प्रसाद द्विवेदी लेखकों की वर्तनी व व्याकरणगत अशुद्धियों को स्वयं संशोधित कर देते थे।
भाव व विषय के अनुसार संस्कृत, उर्दू शब्दों का व्यवहार भी चाहते थे ।
अपने निबन्ध कवि कर्त्तव्य के माध्यम से कवियों को उनके कर्तव्य का बोध करवाते हुए अनेक दिशा निर्देश भी दिए जिससे विषय वस्तु , भाषा शैली, छंद योजना इत्यादि की दृष्टि से काव्य में नवीनता का समावेश हुआ।
आधुनिक युग में गद्य के परिमार्जन, प्रांजल रूप और शुद्धता के अभाव की और सर्वप्रथम इनका ही ध्यान गया। इनके महत्वपूर्ण कार्य के रूप में भाषा संस्कार, व्याकरण शुद्धि, विराम चिह्नों के प्रयोग को रेखंकित किया जा सकता है।
विभक्तियों, विराम चिन्ह के प्रयोग एवं समानार्थक अनेक रूपों के व्यवहार से उत्पन्न अस्पष्टता को दूर करने का प्रयास इन्होंने किया ।
इन्हें गद्य लेखन व संपादन में विशेष सफलता मिली। वैसे इनका हिंदी साहित्य में योगदान एक सर्जक जे रूप में कम, एक विचारक, दिशा निर्देशक ,चिंतक जे रूप में अधिक है।
द्विवेदीजी से प्रेरणा लेकर उनके आदर्शों पर आगे बढ़ने वाले कवियों में मैथिलीशरण गुप्त, गोपाल शरण सिंह, श्री गया प्रसाद शुक्ल स्नेही लोचन प्रसाद पांडेय इत्यादि हैं। वहीं इनकी प्रेरणा से ब्रजभाषा को छोड़ नवीन विषयों पर हिंदी में लिखने वालों में अयोध्या सिंह उपाध्याय 'हरिऔध', श्रीधर पाठक, नाथूराम शर्मा शंकर, राय देवीप्रसाद पूर्ण इत्यादि थे।
इनकी प्रेरणा से काव्य में परम्परागत छंदों के साथ संस्कृत छंदों का भी प्रयोग होने लगा था।इस तरह छंदों के क्षेत्र में भी परिवर्तन परिलक्षित हुआ।
इनके एक निबंध से प्रेरित होकर मैथिलीशरण गुप्त ने चिर उपेक्षिता उर्मिला को महत्व देते हुए साकेत महाकाव्य की रचना की थी ।स्वयं गुप्त ने इस बात को स्वीकार किया है ,-
करते तुलसीदास भी कैसे मानस नाद ?
महावीर का यदि नहीं मिलता उन्हें प्रसाद ।
इनकी मौलिक एवं अनुदित लगभग 80 रचनाएं हैं ।जिनका विवेचन हम अलग से करेंगे।
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