हिंदी के ज्ञाता व हितचिन्तक फ्रेडरिक पिकाण्ट

 हिंदी के ज्ञाता व हितचिन्तक फ्रेडरिक पिकाण्ट

                                                 डॉ. साधना गुप्ता


   19वीं शताब्दी का प्रारम्भ खड़ी बोली हिंदी के लिए विशेष महत्व रखता है। भिन्न-भिन्न कारणों से ही सही, परन्तु इसके विकास के मार्ग खुलते चले गए । लेखक चतुष्ट के माध्यम से प्रारम्भ यह प्रयास अनवरत कदम दर कदम बढ़ाता रहा जिसमें केवल भारतवासियों का ही योगदान हो ऐसा नहीं है। विदेशी विद्वानों का योगदान अवदान भी महत्व पूर्ण रहा है। ऐसी ही एक शख्सियत है,- फ्रेडरिक पिकाण्ट ।


फ्रेडरिक पिकाण्ट-  फ्रेडरिक पिकाण्ट एक ऐसा व्यक्तित्व है  जो  विदेशी होते हुए भी हमेशा भारत के हित चिंतक रहे। इंलैण्ड में 1836 में जन्मे  फ्रेडरिक पिकाण्ट  हिंदी और उर्दू के ज्ञाता थे। उन्होंने यह महारथ इंलैण्ड में बैठे- बैठे ही प्राप्त की थी। हिंदी में लेखन व सम्पादन का कार्य करते हुए आपने हिंदी में लिखने हेतु लेखकों को  प्रोत्साहित  भी किया।  राजा लक्ष्मण सिंह, भारतेंदु हरिश्चंद्र, प्रताप नारायण मिश्र इत्यादि भारतीय हिंदी भाषा के साहित्यकारों से इनका हिंदी में पत्र व्यवहार होता रहता था। तत्कालीन साहित्यकारों के पास उनके दो- चार पत्र मिल जाना सामान्य बात थी। पिकाण्ट  इंलैण्ड  के अखबारों में हिंदी लेखकों और ग्रंथों का परिचय बराबर देते रहते थे। 


प्रेस का कार्य - इन्हें प्रेस का अनुभव भी था। लंदन की प्रसिद्ध 'ऐलन एण्ड कम्पनी' के विशाल छापेखाने के मैनेजर के पद पर आपने कुशलता पूर्वक कार्य किया।

 

सम्पादन -  मैनेजर का पद छोड़ने के बाद एक दूसरी कम्पनी गिलबर्ट एण्ड रिबिगटन के उर्दू व्यापार पत्र 'आईन सौदागरी' का सम्पादन किया । इन्होंने इस पत्रिका के कुछ पृष्ठ हिंदी भाषा के लेखों के लिए सुरक्षित रख उनमें  हिंदी के लेख लिख कर प्रकाशित किए। इस प्रकार इंलैण्ड  में रहते हुए हिंदी के लेखकों के विषय में जानकारी देते रहे।


पुस्तकें - 


बाल दीपक - यह चार भागों में प्रकाशित की गई थी। इसकी लिपि नगरी और कैथी है। यह बिहार के स्कूल में पढ़ाई जाती थी।


विक्टोरिया चरित्र- विक्टोरिया चरित्र पुस्तक 136 पृष्ठ की थी। इसकी भाषा पत्रों की भाषा से अधिक मुहावरेदार थी।


 ये दोनों पुस्तकें खड्गविलास प्रेस,  बाँकीपुर से छपी थी।

 

 फ्रेडरिक पिकाण्ट भारतीय साहित्य  और जनहित के लिए बराबर प्रयास करते रहे। जीवन के अंतिम दिनों में भारत भी आए थे और लखनऊ में ही 7 फरवरी, 1896 ई. को उनका देहांत हुआ तथा अंतिम संस्कार भी भारत में ही हुआ। 


महत्व - फ्रेडरिक पिकाण्ट के महत्व को विस्मृत नहीं किया जा सकता। वर्तमान में इनके कार्य की प्रासंगिकता इस बात से सिद्ध होती है कि फ्रेडरिक पिकाण्ट ने मूलतः इंलैण्ड के होते हुए भी भारत भूमि एवं भारत के भाषा-साहित्य के प्रति जो आत्मीयता और लगाव अभिव्यक्त किया वह हिंदी भाषा के महत्व को उजागर करता है। यह स्पष्ट करता है,- सुभाषित जहाँ से भी मिले, ग्रहण जॉन चाहिए।किसी भी भाषा-साहित्य  का महत्व उसमें अभिव्यक्त जीवन मूल्यों से होता है। क्योंकि विचार ही महत्वपूर्ण होते हैं। हम जैसा सोचते हैं, वैसा ही कर्म करते हैं और वैसा ही हमारा आचरण बन जाता है, पहचान बन जाती है। 


आज हम अपनी भाषा को छोड़ बैठे हैं, परिणाम अपने जीवन मूल्यों को खोकर अकेलेपन को झेल रहे हैं। तो आइए हम पुनः अपनी भाषा और संस्कृति की और लौटें....

 

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