सांस्कृतिक क्षरण का प्रतिफल है - विवाह विच्छेद

  

सांस्कृतिक क्षरण का प्रतिफल है -  विवाह विच्छेद

                                                                                                                      डॉ. साधना गुप्ता


  आज समाज में प्रत्येक व्यक्ति परेशान है,-अकेलेपन से। विज्ञान ने विश्व ग्राम की संकल्पना को भले ही सार्थक कर दिया हो परन्तु ग्राम्य जीवन की आत्मीयता के भाव कहीं खो गए है। दर्द हल्का करने वाला कन्धा और गोद दोनों का अभाव सा हो गया है। ऐसे में दाम्पत्य सम्बन्धों की रसमयता भी सूख गयी और उसका स्थान ले लिया अधिकारों ने, स्वत्व की प्रतिस्पर्धा में छिन्न- भिन्न होते सम्बन्ध और चरमराते पारिवारिक ढ़ाचे का मूल कारण क्या है? इसी की खोज करने का प्रयास हमारा यह आलेख है।   

अपनी भाषा एवं संस्कृति का परित्याग - किसी भी समाज की भाषा केवल सम्प्रेक्षण का माध्यम नहीं होती। वह भाषा उस मानव समाज की संस्कृति की वाहक भी होती है जो अपने साथ समूची सांस्कृतिक परम्परा को साथ लेकर चलती है। यही कारण है वह हमें अनायास ही जीवन जीने का पाठ भी पढ़ा देती है परन्तु आज हम अपनी भाषिक क्षमता और सांस्कृतिक निधियों को तिलांजलि देकर पाश्चात्य भाषा को अपना रहें है और साथ ही पाश्चात्य मूल्यों  को  भी अपनाने के फलस्वरूप  व्यक्ति और समाज मानवीय मूल्यों से छिटक जिस यंत्रचालित परिवेश में आ खड़ा हुआ है वहां हमारी मेधा स्वार्थ के चमकीले  आच्छादन से आच्छादित परमार्थ तो  बहुत दूर की बात है, परसत्ता तक को स्वीकार करने को तैयार नहीं है। ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति मानव ने उस ईश्वर की सत्ता को अस्वीकार कर दिया है तो फिर संयुक्त परिवार को स्वीकार करने की, परस्पर त्याग करने की भावना का लोप हो जाना स्वाभाविक है।

एकल परिवार में एकल सन्तान- आज "एकल परिवार में एकल सन्तान" ने "एक तो करेला, दूजा नीम चढ़ा" की कहावत को पूर्णतः चरितार्थ कर  दिया। स्वार्थ के अतिरिक्त कुछ नजर ही नहीं आता, तब स्वयं के अतिरिक्त अन्य के अधिकार का तो प्रश्न ही नहीं उठता ? 

शर्तिया विवाह - तत्पश्चात परिपक्व उम्र में दहेज के आधार पर शर्तिया शादी ? निश्चित ही प्रेम, समर्पण, विश्वास से संयुक्त सात जन्मों का साथ तो कदापि नहीं हो सकती। तब शादी "यूज एंड थ्रो" का पर्याय बनती जा रही है। ऐसे में परस्पर प्रतिस्पर्धा की भावना पति - पत्नी को जीवनसाथी कम, प्रतिद्वंद्वी ही अधिक बना रही है, जिसका परिणाम विवाह विच्छेद (तलाक) के रूप में प्रत्यक्ष दृष्टिगोचर हो रहा है। 

इसके लिए एक व्यक्ति नहीं समूचा समाज जिम्मेदार है। आज हमनें जिस संस्कृति को अपना लिया है ,उसमें यह सामान्य बात है । फिर हम इतने चिंतित क्यों है? "बोया पेड़ खजूर का आम कहां से पाए"? हम पाश्चात्य संस्कृति का पाठ पढ़ा कर भारतीय संस्कारों की आशा क्यों कर रहे हैं ? सत्य ही हमने चिंतामणि छोड़ कर कांच को अपना लिया है ।


उपाय- यह लाईलाज हो, ऐसा कदापि नहीं है। यदि हम पुनः अपनी भाषा की ओर लौटें तो संस्कृति स्वतः ही समाज का संस्कार कर देगी। क्योंकि भाषा मे निहित भाव उन शब्दों को मंत्र बना देता है और उसके द्रष्टा को मंत्र द्रष्टा ।जैसे जड़  में लगी  दीमक को विनष्ट कर देने से पत्र-पुष्प स्वतः ही प्रफुप्ल्लित हो उठते हैं उसी प्रकार हम अपनी भाषा को अपना लें तो निश्चित ही हमारी सांस्कृतिक विरासत हमारे जीवन को पुनः प्रफुल्लित कर देगी। तो आइए अभी भी वक्त है - कहा भी गया है,- जब जागो तभी सवेरा ।

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