महामानव बनने की सहज साधना

      महामानव बनने की सहज साधना 


                                              डॉ. साधना गुप्ता

 एक बात जो संसार के प्रत्येक व्यक्ति के लिए निर्विवाद रूप से कही जा सकती है वह है,- प्रसन्नता, सुख एवं शांति की अपेक्षा-आकांक्षा। हमारे संपूर्ण जीवन के  कार्य कलाप  की आधारशिला यही है। यही कारण है कि इस प्रयास में सफलता सौभाग्य और  विफलता  हतभाग्य के रूप में परिभाषित की जाती है। सरल शब्दों में कहें तो जीवन की प्रसन्नता को ही भाग्य और दुर्भाग्य का मापदंड समझा जाता है। इसी कारण उसे ईश्वर की देन मानकर व्यक्ति स्वीकार करता आया है। परंतु प्रसन्नता ईश्वर प्रदत्त भाग्य  या दुर्भाग्य नहीं,  स्वयं व्यक्ति के  वश  की  बात  है।    आइए देखें,- कैसे ?


प्रसन्नता- प्रसन्नता को समझने के लिए स्वेट मॉर्डन  का यह कथन पर्याप्त है,- 'प्रसन्नता  तो 'मनुष्य की परछाई की तरह है। हम इसके पीछे जितने भागते हैं उतनी ही यह हमसे दूर होती जाती है और जैसे ही खड़े रहकर हम अपने आसपास देखते हैं तो वह हमें  अपने पैरों में ही खड़ी मिल जाती है।' वास्तव में प्रसन्नता बाहरी संसाधनों या परिस्थितियों से प्राप्त होने वाली वस्तु नहीं है। यह तो हमारे अंतः करण में ही है और हमें सदा उपलब्ध भी  है  परंतु हम समस्याओं में इतने उलझे होते हैं कि हल सामने होने पर भी दिखता नहीं है। अतः यदि हम अपनी मनः स्थिति को तदनुकूल  बना ले तो  निश्चित ही तत्काल उसका अनुभव कर सकते हैं। 


सकारात्मक सोच और आशा-  जीवन का उत्सव वही मनाता है जो मृत्यु की ऊँगली थाम कर चलता है अतः भय को नहीं आशा को चुनें, नकारात्मकता को नहीं सकारात्मकता को चुनें। सदैव याद रखें,- 'जीवन मृत्यु की छाया में ही पलता है'। बहुत कम लोग जानते हैं कि यह नारकीय उत्पीड़न उनकी स्वयं की उपज है - जिसे मनःक्षेत्र में स्वयं ही बोया और स्वयं ही काटा जाता है। जैसे किसान खेत में अपनी इच्छित फसल बोता  है, ठीक उसी प्रकार मनुष्य भी सुख और दुख के, स्वर्ग और नरक के बीच बोता है। प्रयत्न पूर्वक उन्हें सींचता भी है और काटता भी है परन्तु भ्रांति वश उन्हें दूसरे के कृत्य समझ लेता है, यह आत्मप्रवंचना के अतिरिक्त कुछ नहीं।

 

   दुःख का बीज बो कर सुख की फसल नहीं प्राप्त की जा सकती है। वस्तुतः विचार महत्वपूर्ण होते हैं। इनकी स्थिति बहते हुए जल के समान है जिसमें आप गंदगी मिलाएंगे तो वह नाला बन जाएगा और सुगंध मिलाएंगे तो वह गंगाजल कहलायेगा। अतः कोशिश करो जिंदगी का हर पल अच्छे से गुजरे क्योंकि जिंदगी रहे ना रहे मगर अच्छी यादें हमेशा जिंदा रहती है। अतः सकारात्मक सोच और आशा का दामन कभी ना छोड़ें। यह कभी  ना सोचें,- जिंदगी  में कितने पल हैं वरन् यह सोचें,- हर पल में कितनी जिंदगी है। फिर देखिए आपका नजरिया कैसे बदल जाएगा। 


विश्वास स्वयं पर एवं परमात्मा पर- जीवन है तो संघर्ष तो रहेंगे ही परंतु विश्वास रखें स्वयं पर और परमात्मा पर भी। गीली मिट्टी को आग में ना डालें तो गीली ही रहती है। शीतल जल देने वाले मिट्टी के पात्र को भी आग में तपना पड़ता है। ठीक उसी प्रकार जीवन को नियंत्रित करने का साधन अनुशासन ही दुःख  है। वस्तुतः वह अनुशासन तो उसमें निखार लाता है। ध्यान रहे जो अंधेरे के डर से दीपक नहीं जलाते वह अंधेरे में ही रहते हैं परंतु दीपक उस अंधकार को नष्ट कर रास्ता दिखाता है, या यह कहना चाहिए कि प्रकाश का अभाव अंधकार है जिसे दीपक नष्ट कर देता है। ठीक इसी प्रकार स्वयं  पर व परमात्मा पर विश्वास का अभाव दुःख व निराशा है। आप विश्वास की डोर थामें रहिए,- फिर देखिए कोई संघर्ष आप के मुख से मुस्कान नहीं छीन सकता। जीवन में जो जो संग्रहणीय होता है हम उसे भूल अभाव का रोना रोते रहते हैं। परंतु हमें चाहिए ,- जीवन के हर मोड़ पर सुनहरी यादों को जीवित रहने दें, जुबां पर हरदम मिठास रहने दें,- यदि इस अंदाज से जीवन जीने का प्रयास करेंगे तो ना स्वयं उदास रहेंगे ना दूसरों को रहने देंगे,- अजमा कर देख लीजिए।


 निर्भय एवं उत्साही रहें -  शिकारी को देखकर शुतुरमुर्ग की तरह बालू में मुँह छिपा लेना और यह सोचना,- 'जब मैं ही शिकारी को नहीं देख रहा तो वह भी मुझे कैसे देख सकेगा'? यह एक उपहासास्पद विडंबना के अतिरिक्त कुछ नहीं है जो उसे बचाव के स्थान पर सहज ही शिकारी की पकड़ में धकेल देती है। वस्तुतः ऐसे समय में अपनी क्रिया और उसकी प्रतिक्रिया को समझते हुए दुःखों का कारण और निराकरण  ढूढ़ने में जुटने की आवश्यकता होती है, जिसे न कर हम दूसरों पर दोष मढ़ते  हैं और स्वयं को निर्दोष समझते हैं।


       वस्तुतः भय दुनिया का सबसे बड़ा पिंजरा है। पराजय नहीं वरन् व्यक्ति को भय तोड़ता है। सदैव ध्यान रहें,- एक द्वार बन्द हुआ है, सभी द्वार नहीं। तो देर किस बात की? हमें दूसरा द्वार खोजना होगा क्योंकि हालात बदलने पर ही हालत बदलती है।

 कभी-कभी साधन संपन्न एवं अनुकूलताओं से भरे पूरे व्यक्ति  भी विकृत चिंतन का शिकार होकर अहर्निश दुःख-दुर्भाग्य का रोना रोते हुए त्रास सहते नजर आते हैं। इसके विपरीत जिनके सोचने का तरीका सही है वे स्वल्प साधनों में, कठिन परिस्थितियों में, अनगढ़ लोगों के मध्य रहते हुए भी ताल मेल बैठा लेते हैं।


वस्तुतः उड़ने के लिए पंख ही नहीं, ऐसे हौसलों की जरूरत होती है जो सागर की तरह गहरा हो। खुशबू हवा को बांधती नहीं वरन् उसके सर्वोच्च को सार्थक कर देती है। वैसे ही समझा यह जाता है कि परिस्थितियाँ मनुष्य को प्रभावित करती है और सुख-दुख का आधार बनती है जबकि  वस्तुस्थिति मनःस्थिति की प्रधानता सिद्ध करती है और बताती है कि चिंतन का स्तर ही उल्टे सीधे  दृश्य दिखाता है, रुलाने-हँसाने वाले सपने सामने ला खड़े करता है। अतः चिंतन के इस केंद्र को पकड़ लिया जाए, समझ लिया जाए तो खीज से, तनाव से, सदैव के लिए मुक्ति मिल सकती है।  आनंद उल्लास का वातावरण अनवरत जीवन का अभिन्न अंग बन सकता है।


 प्रसन्नता मन का विषय- प्रसन्नता  मन का विषय है। प्रसन्नता की अनुभूति  मन में  होती है, जबकि सुख-सुविधाओं की पहुँच देह तक ही सीमित होती है क्योंकि स्थूल वस्तुओं का संबंध स्थूल वस्तुओं से ही होता है, वह सूक्ष्म तत्वों को प्रभावित नहीं कर सकती। जैसे प्रकाश को बांधने का, हवा को छेदने का कार्य अस्त्र-शस्त्र से नहीं किया जा सकता। स्थूल दीवार उनमें अवरोध उत्पन्न करने पर भी उनके स्वरूप को प्रभावित नहीं कर सकती, उसी प्रकार बाहरी सुख-साधन प्रसन्नता में व्यवधान भले उपस्थित कर दे पर उसे प्राप्त नहीं करवा सकते।


 प्रसन्नता का संबंध मनःजगत से है, अतः उसे धन से, साधन संपन्नता से नहीं प्राप्त किया जा सकता। उसकी क्षुधा मनः स्थिति के स्तर पर ही तृप्त की  जा सकती है। परिस्थितियों का परिवर्तन मादक द्रव्य  के समान क्षणिक आनन्द का  भ्रम भले ही उत्पन्न कर दे परंतु उससे उसके वास्तविक प्रयोजन की सिद्धि नहीं होती। यह स्थिति ठीक वैसी ही है जैसे तृषा तृप्ति शीतल जल से ही होती है, सोड़ा वाटर, चाय या कॉफी से नहीं। अतः प्रसन्नता की प्यास को बुझाने के लिए भी उसी स्तर के जल की आवश्यकता होती है और यह जल है,- जीवन के प्रति सुलझा हुआ दृष्टिकोण। 


जीवन के प्रति सुलझा हुआ दृष्टिकोण- प्रसन्नता हमारे लिए जितनी आवश्यक है उसकी पूर्ति हेतु हमारे चित्त में स्वस्थ दृष्टिकोण भी उतना ही आवश्यक है, परंतु पग-पग पर दुःखों का रोना रोने वाले व्यक्ति की स्थिति ठीक वैसी ही है जैसे स्वच्छ पर्यावरण के मध्य कोई व्यक्ति नाक मुँह बंद कर दम घुटने  की बात कहे। अधिकांश मनुष्य जिन दुःखों से दुःखी पाए जाते हैं उनमें से अधिकांश मानसिक होते हैं। अनुमानतः मानव जीवन में 5 प्रतिशत शरीर पीड़ा जैसे वास्तविक कष्ट  हैं और 95 प्रतिशत मानसिक या काल्पनिक, जिनका अस्तित्व अंधकार की तरह है जो दिखता तो है पर है नहीं। पुनश्चः जैसे प्रकाश के अभाव का नाम अंधकार  है उसी प्रकार दूरदर्शी विवेक बुद्धि के अभाव का नाम मानसिक कष्ट है  जिसकी अभिव्यक्ति  खीझ, शोक, उद्वेग, असंतोष ,रोग, काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, ईर्ष्या, द्वेष, आक्रोश, प्रतिशोध इत्यादि मनोविकारों की प्रतिच्छाया स्वरूप मानसिक कष्टों की विभीषिका बनकर अभिव्यक्त होती है और हमें नारकीय पीड़ा पहुँचाती है। 


प्रसन्न रहने की मनोभूमि बनाएँ-  प्रसन्न रहने की मनोभूमि तैयार करने हेतु निम्न कार्य करें-   

 

   उपलब्ध साधनों  में उपयोगिता खोजने की गुण ग्राही दृष्टि अपनाते हुए कार्य किया जाए। 


   सफलता-असफलता को दूसरे के हाथ की वस्तु समझकर कर्तव्य पालन पर अपने संतोष  को केंद्रित रखा जाए। 


   भौतिक संपदा को अभाव रहने तक ललक जगाने वाली और मिलते ही भार बन जाने वाली तृष्णा समझ कर अपनी सफलता का समग्र केंद्र परिष्कृत गुण, कर्म, स्वभाव को माना जाय जिससे महत्वाकांक्षाओं का केंद्र बदल जाएगा। व्यक्ति आत्मवान बनने का प्रयास करे, संपत्तिवान नहीं, क्योंकि इससे न केवल वह स्वेच्छा से महामानव  बन सकता है अपितु जिससे उसे  प्रसन्नता के भी संपूर्ण आधार  मिल जाते हैं। साथ ही व्यक्तित्व के प्रभावशाली हो जाने से आत्मसम्मान और लोक सम्मान में भी कमी नहीं रहती। ऐसी संतुष्ट और आशान्वित अंतः चेतना की पहचान होती है ,- उनके  अधरों की मुस्कान और जिसमें समाहित होता है आकर्षक आकर्षण। लगता है मानों आंतरिक उल्लास मुस्कान रूपी सुगंध के रूप में अपनी उपस्थिति का प्रमाण दे रहा है।

 

प्रसन्नता: मानसिक साधना- प्रसन्नता को मानसिक साधना के रूप में अपनाया जाना चाहिए। एकांत हो या कार्य का समय, हर वक्त प्रसन्न मुद्रा में रहने का प्रयत्न करना चाहिए। इसके लिए स्वयं परीक्षण हेतु दर्पण का सहयोग लें। उसमें देखिए कहीं आपके चेहरे से जीवन की परेशानियाँ झांक तो नहीं रही। यदि उदासी, खींझ, क्रोध, चिंता  का लेश मात्र भी दिखे तो तुरंत सजग होकर उसे दूर करने का प्रयास करना चाहिए और उसके स्थान पर मुस्कान को स्थापित करना चाहिए। सतत अभ्यास इसे आपकी आदत के रूप में परिवर्तित कर देगा तब आपके व्यक्तित्व में चार चांद लग जाएंगे। 


जब भी किसी से कहीं पर भी मिलें, वार्ता करें, मुस्कराहट के रूप में उस मिलन पर प्रसन्नता व्यक्त करें तो सामने वाले को अपने आत्मीयता पूर्ण स्वागत सत्कार का आभास होता है। यह आनंददायक भावनात्मक अनुदान भौतिक उपहार से श्रेष्ठ होता है और सामने वाले की यह तृप्ति हमें भविष्य में उसके स्नेह और सहयोग के प्रति आशान्वित करती है। दूसरों को अपना बनाने के इस जादुई तरीके से अधिक सरल सहज और प्रभावशाली तरीका दूसरा नहीं। 


सार रूप में   सांस्कृतिक धरातल पर हमारी आस्थाओं, मान्यताओं, दृष्टिकोण में  इस आदर्श की प्रतिष्ठा से ही ईर्ष्या और असंतोष की प्रवृत्ति से मुक्ति मिल सकती है। प्रसन्नता, शांति और आनंद को प्रभु की अनंत अनुकंपा, देवीय वरदान मान अपने स्वभाव का अंग बना कर ही हम प्राकृतिक परिवेश का आनंद ले कर प्रसन्न रह सकते हैं और बन सकते हैं महामानव। तो फिर देर किस बात की.....

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