गुप्त नवरात्रि-शक्ति साधना का पर्व

         

    गुप्त नवरात्रि - शक्ति साधना का पर्व 


                                          डॉ. साधना गुप्ता                                                  

संस्कृत शब्द 'नवरात्रि' का अर्थ है नौ रातें,'  जिसमें शक्ति स्वरूपा माँ  के नौ स्वरुपों की पूजा अर्चना की जाती है। हिन्दू संस्कृति में इन नवरात्रों का अत्यधिक महत्व है। सांस्कृतिक आधार के संग इनका व्यावहारिक धरातल पर भी विशेष स्थान है।उसी पर दृष्टि केंद्रित करना हमारा यहाँ उद्देश्य है। 

    हमारे धर्म शास्त्रों में कुल चार नवरात्रि का जिक्र किया है- शरद, चैत्र, माघ और आषाढ़। इन चार नवरात्र में से दो को प्रत्यक्ष नवरात्र कहा गया और दो को गुप्त नवरात्र। माघ और आषाढ़ नवरात्रि को गुप्त नवरात्रि कहा जाता है। 

गुप्त नवरात्र का अर्थ- गुप्त नवरात्र में तंत्र साधना का विशेष महत्व रहा है। चूंकि तंत्र साधना गुप्त रूप से की जाती है अतः यह गुप्त नवरात्र के नाम से जाने जाते हैं। इनमें आमतौर पर तंत्र विद्या में रुचि रखने वाले साधक और तांत्रिको द्वारा साधना के साथ सिद्धियों की भी प्राप्ति की जाती है। प्राचीनकाल में गुप्त नवरात्र ही ज्यादा प्रचलित थीं। बाद में चैत्र नवरात्र  आया और फिर शारदीय नवरात्र। गुप्त नवरात्र आषाढ़ और माघ मास में की जाती है।

 प्रत्यक्ष और गुप्त नवरात्र में अंतर - चैत्र और आश्विन माह के शु-क्ल पक्ष प्रतिपदा से नवमी तक दो प्रत्यक्ष नवरात्रि होती हैं और माघ व आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से नवमी तक दो गुप्त नवरात्रि होती हैं।

   चार नवरात्र में से दो को प्रत्यक्ष नवरात्र कहा जाता है क्योंकि इनमें गृहस्थ जीवन वाले सभी व्यक्ति साधना पूजन करते हैं। उनकी पूजा अर्चना का केंद्र सांसारिक जीवन से जुड़ी हुई चीजों को प्रदान करने वाले देवी के 9 रूपों से होता है, लेकिन जो दो गुप्त नवरात्र होते हैं, उनमें आमतौर पर साधक सन्यासी, सिद्धि प्राप्त करने वाले, तांत्रिक-मांत्रिक देवी की उपासना करते हैं। हालांकि चारों नवरात्रियों में शक्ति स्वरूपा देवी की आराधना की जाती है। लेकिन गुप्त नवरात्र के दिनों में देवी की जिस दस महाविद्याओं की पूजा की जाती है, उनका तंत्र शक्तियों और सिद्धियों में विशेष महत्व है।  गुप्त नवरात्र में अगर आमजन चाहें तो किसी विशेष इच्छा की पूर्ति या सिद्धि के लिए उपासना कर सकता है । गुप्त नवरात्रि में मां दुर्गा के रूप में शक्ति की उपासना की जाती है। जीवन की समस्त समस्याओं को दूर करने के लिए यह समय बहुत ही महत्वपूर्ण माना गया है। मां दुर्गा  सप्तशती में कुछ ऐसे सिद्ध मंत्र हैं, जिनके द्वारा हम अपनी मनोकामना की पूर्ति कर सकते हैं। पूरी नवरात्रि के दिनों में इन मंत्रों का जाप करने से सभी प्रकार‍ की मनोकामना अवश्य पूरी होती है, -ऐसा जनविश्वास है-

सर्व मंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके। 

शरण्येत्र्यंबके गौरी नारायणि नमोस्तुऽते॥ 


* आरोग्य एवं सौभाग्य प्राप्ति के लिए- 

देहि सौभाग्यं आरोग्यं देहि में परमं सुखम्‌। 

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषोजहि॥ 

 

* बाधा मुक्ति एवं धन-पुत्रादि प्राप्ति के लिए- 

सर्वाबाधा विनिर्मुक्तो धन धान्य सुतान्वितः।

मनुष्यों मत्प्रसादेन भवष्यति न संशय॥ 


* सुलक्षणा पत्नी प्राप्ति के लिए- 

पत्नीं मनोरमां देहि मनोवृत्तानुसारिणीम्। 

तारिणीं दुर्ग संसारसागस्य कुलोद्‍भवाम्।। 

 

* दरिद्रता नाश के लिए- 

दुर्गेस्मृता हरसि भतिमशेशजन्तो: स्वस्थैं: स्मृता मतिमतीव शुभां ददासि। 

दरिद्रयदुखभयहारिणीकात्वदन्या सर्वोपकारकरणाय सदार्द्रचित्ता।। 

 

* ऐश्वर्य प्राप्ति एवं भय मुक्ति मंत्र- 

ऐश्वर्य यत्प्रसादेन सौभाग्य-आरोग्य सम्पदः। 

शत्रु हानि परो मोक्षः स्तुयते सान किं जनै॥ 

 

* विपत्तिनाशक मंत्र- 

शरणागतर्दिनार्त परित्राण पारायणे। 

सर्वस्यार्ति हरे देवि नारायणि नमोऽतुते॥ 

 

* शत्रु नाश के लिए- 

ॐ ह्रीं बगलामुखी सर्वदुष्‍टानां वाचं मुखं पदं स्तंभय जिह्वाम् कीलय बुद्धिम्विनाशाय ह्रीं ॐ स्वाहा।।

 

* स्वप्न में कार्य-सिद्धि के लिए- 

दुर्गे देवी नमस्तुभ्यं सर्वकामार्थसाधिके। 

मम सिद्धिमसिद्धिं वा स्वप्ने सर्वं प्रदर्शय।। 

 

* सर्वविघ्ननाशक मंत्र- 

सर्वबाधा प्रशमनं त्रेलोक्यस्यखिलेशवरी। 

एवमेय त्वया कार्य मस्माद्वैरि विनाशनं

   इनमें से भी माघ गुप्त नवरात्रि को  तंत्र-मंत्र और सिद्धि साधना के लिए बेहद खास माना जाता है। इस दौरान दस महाविद्याएं,-  मां कालिके, मां तारा देवी, मां त्रिपुर सुंदरी, मां भुवनेश्वरी देवी, माता चित्रमस्ता, मां त्रिपुर भैरवी, माता बग्लामुखी, मां कलमा देवी, मां धूम्रवती और मां मांतगी की आराधना की जाती हैं। कहा जाता है की  अपनी आराधना को गुप्त रखने वाले साधक को दुगुना फल मिलता है।

 पूजन विधि-  दुर्गा को प्रसन्न करने के लिए  गुप्त नवरात्रि के दौरान तांत्रिक और अघोरी मां दुर्गा की आधी रात में पूजा करते हैं। मां दुर्गा की प्रतिमा या मूर्ति स्थापित कर लाल रंग का सिंदूर और सुनहरे गोटे वाली चुनरी अर्पित की जाती है। इसके बाद मां के चरणों में पानी  नारियल, केले, सेब, खील, बताशे और श्रृंगार का सामान अर्पित किया जावालाता है। मां दुर्गा को लाल पुष्प चढ़ाना शुभ माना जाता है।कहा जाता है कि सरसों के तेल से दीपक जलाकर 'ॐ दुं दुर्गायै नमः' मंत्र का जाप करना चाहिए।

गुप्त नवरात्र का महत्व- चारों नवरात्र प्रति वर्ष तीन-तीन माह के अंतराल पर आती हैं। प्रत्यक्ष तौर पर चैत्र, गुप्त आषाढ़, प्रत्यक्ष आश्विन और गुप्त पौष माघ में मां दुर्गा की उपासना करके इच्छित फल की प्राप्ति की जाती है। प्रत्यक्ष नवरात्र में मां के 9 स्वरूपों की पूजा की जाती है और गुप्त नवरात्र में 10 महाविद्या की साधना की जाती है।

      गुप्त नवरात्रों का महत्व, प्रभाव और पूजा विधि वर्णित करने वाले ऋषियों में श्रृंगी ऋषि का नाम सबसे पहले लिया जाता है। धार्मिक कथाओं के अनुसार, एक बार एक महिला श्रृंगी ऋषि के पास आई और अपने कष्टों के बारे में बताया। महिला ने हाथ जोड़कर ऋषि से कहा कि मेरे पति दुर्व्यसनों से घिरे हुए हैं और इस कारण वह कोई धार्मिक कार्य, व्रत या अनुष्ठान नहीं कर पा रही है। ऐसे में वह क्या करे कि मां शक्ति की कृपा प्राप्त हो और मुझे मेरे कष्टों से मुक्ति मिले। तब ऋषि ने महिला को कष्टों से मुक्ति पाने के लिए गुप्त नवरात्र में साधना करने के लिए कहा था। ऋषिवर ने  साधना की विधि बताते हुए कहा कि इससे तुम्हारा पति सन्मार्ग की तरफ बढ़ेगा और तुम्हारा पारिवारिक जीवन सुखमय हो जाएगा

    वस्तुतः यह नवरात्रि उत्सव देवी अंबा का प्रतिनिधित्व करता है वहीं चारों नवरात्रि के दौरान ऋतु परिवर्तन भी होता है और साधना व पूजा-पाठ के लिए ग्रह-नक्षत्रों की विशेष स्थिति बनती है। जिससे इनकी पूजा करने का फल भी कई गुना मिलता है। ऋतु परिवर्तन से स्वास्थ्य रक्षा करने के लिए सात्विक भोजन और संयम की आवश्यकता होती है। नवरात्रि साधना से इसकी पूर्ति स्वतः ही हो जाती है । नवरात्रि विधान का लक्ष्य यही है। हमारे मनिषियों ने जीवन के लिए हितकर प्रत्येक आवश्यक कार्य को धर्म से जोड़कर जन जीवन का अंग बना कर जीवन जीने का एक विलक्षण मार्ग प्रदान किया जिसकी प्रासंगिकता पर आज भी प्रश्न नहीं उठाया जा सकता। वसंत  और शरद ऋतु की शुरुआत, जलवायु और सूरज के प्रभावों का महत्वपूर्ण संगम माना जाता है। इन दो समय मां दुर्गा की पूजा के लिए पवित्र अवसर माने जाते है। त्योहार की तिथियाँ चंद्र कैलेंडर के अनुसार निर्धारित होती हैं। नवरात्रि पर्व, माँ-दुर्गा की अवधारणा भक्ति और परमात्मा की शक्ति स्वरूप उदात्त,  परम रचनात्मक ऊर्जा की पूजा का सबसे शुभ और श्रेष्ठ अवसर माना जाता है। यह पूजा वैदिक युग से पहले, प्रागैतिहासिक काल से चली आ रही है।  वैदिक युग के बाद से, नवरात्रि के दौरान की भक्ति प्रथाओं में मुख्य रूप गायत्री साधना का हैं।

निषेध- गुप्त नवरात्रि के दौरान मांस-मदिरा, लहसुन और प्याज का बिल्कुल सेवन नहीं करना चाहिए।

- मां दर्गा स्वयं एक नारी हैं, इसलिए नारी का सदैव सम्मान करना चाहिए। जो नारी का सम्मान करते हैं, मां दुर्गा उन पर अपनी कृपा बरसाती हैं।

- नवरात्रि के दिनों में घर में कलेश, द्वेष या किसी का भी अपमान नहीं करना चाहिए। कहते हैं कि ऐसा करने से समृद्धि नहीं होती।

- नवरात्रि में स्वच्छता का विशेष ख्याल रखना चाहिए। नौ दिनों तक सूर्योदय से साथ ही स्नान कर साफ वस्त्र धारण करने चाहिए।

- नवरात्रि के दौरान काले रंग के वस्त्र नहीं धारण करने चाहिए और ना ही चमड़े के बेल्ट या जूते पहनने चाहिए।

- मान्यता है कि नवरात्रि के दौरान बाल, दाढ़ी और नाखून नहीं काटने चाहिए।

-नवरात्रि के दौरान बिस्तर पर नहीं बल्कि जमीन पर सोना चाहिए। 

- घर पर आए किसी मेहमान या भिखारी का अपमान नहीं करना चाहिए।

प्रासंगिकता-  शक्ति स्वरूपा माँ की आराधना नारी सम्मान और नारी शक्ति का उद्धोष करती है। प्रत्येक नारी में उसी शक्ति सामर्थ्य की अपेक्षा करती है और पुरुष समाज को नारी के प्रति सम्मानित द्रष्टिकोण अपनाने की विवक्षा रखती है। नारी स्वरूप माँ की आराधना करने वाला पुरुष जब समाज में नारी पर कुदृष्टि रखेगा तो पुनः एक दिन नारी को कोमलता का बाना उतार कर महिषासुर मर्दिनी बनना होगा,- इस तथ्य का उद्धोष करती है। जागो! नहीं तो अब वह दिन दूर नहीं है.... 



   







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