दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे, आजाद ही रहे हैं, आजाद ही रहेंगे'- चन्द्रशेेेखर आजाद
दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे, आजाद ही रहे हैं, आजाद ही रहेंगे'- चन्द्रशेेेखर आजाद
डॉ. साधना गुप्ता
की गोलियों का हम सामना करेंगे, आजाद ही रहे हैं,दुश्मन आजाद ही रहेंगे',- एक वक्त था जब चंद्रशेखर आजाद के इस नारे को हर युवा रोज दुहराता था। वो जिस शान से मंच से बोलते थे, हजारों युवा उनके साथ जान लुटाने को तैयार हो जाते थे। आइए आज उनका पुण्य स्मरण करते हैं-
प्रारम्भिक जीवन- चन्द्रशेखर आजाद का जन्म भाबरा गाँव (अब चन्द्रशेखर आजादनगर) जिला अलीराजपुर में एक ब्राह्मण परिवार में 23 जुलाई सन् 1906 को हुआ था। उनके पूर्वज बदरका (उन्नाव जिला) बैसवारा से थे। आजाद के पिता पण्डित सीताराम तिवारी एवं माँ जगरानी देवी नाम से पहचाने जाते थे। चन्द्रशेखर का पूरा नाम तिवारी था। आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र भाबरा में बचपन में आजाद ने भील बालकों के साथ खूब धनुष-बाण चलाये। इस प्रकार उन्होंने निशानेबाजी बचपन में ही सीचन्द्रशेखरख ली,जो बाद में काम आयी।
चन्द्रशेखर से आजाद का सफ़र - 14 साल की उम्र में ही वो गिरफ्तार हुए और जज के समक्ष प्रस्तुत किए गए। जज ने जब उनका नाम पूछा तो पूरी दृढ़ता से उन्होंने अपना नाम 'आजाद', पिता का नाम 'स्वतंत्रता' और 'जेल' को उनका निवास बताया। परिणाम स्वरूप उन्हें 15 कोड़ों की सजा दी गई। हर कोड़े के वार के साथ उन्होंने, 'वन्दे मातरम्' और 'महात्मा गाँधी की जय' का स्वर बुलन्द किया। इसके बाद से ही वे सार्वजनिक रूप से आजाद कहलाए।
चन्द्रदेखर के क्रांतिकारी कदम- सन् 1922 में चौरी-चौरा की घटना के बाद गांधीजी ने आंदोलन वापस ले लिया तब देश के कई नवयुवकों की तरह आज़ाद का भी कांग्रेस से मोहभंग हो गया। जब पण्डित राम प्रसाद बिस्मिल, शचीन्द्रनाथ सान्याल, योगेशचन्द्र चटर्जी ने 1924 में उत्तर भारत के क्रान्तिकारियों को लेकर एक दल हिन्दुस्तानी प्रजातान्त्रिक संघ का गठन किया। चन्द्रशेखर आज़ाद इस दल में शामिल हो गए। यहीं से उनकी गतिविधियों का दौर तेज हो गया। एक तरह से जैसे उनका जीवन ही बदल गया। रामप्रसाद बिस्मिल के नेतृत्व में आजाद ने काकोरी कांड (1925) में सक्रिय भाग लिया । चंद्रशेखर आजाद ने 1928 में लाहौर में ब्रिटिश पुलिस ऑफिसर एसपी सॉन्डर्स को गोली मारकर लाला लाजपत राय की मौत का बदला लिया। उन्होंने सरकारी खजाने को लूट कर संगठन की क्रांतिकारी गतिविधियों के लिए धन जुटाना शुरू कर दिया। उनका मानना था कि यह धन भारतीयों का ही है जिसे अंग्रेजों ने लूटा है।
आजादी की अनोखी कहानी- आजाद के नाम से अंग्रेजी हुकूमत में इतनी दहशत थी कि पुलिस की एक्का दुक्का टुकड़ी सूचना मिलने के बाद छापेमारी में भी दहशत खाती थी। 17 जनवरी 1931 को आजाद पर इनाम की घोषणा कर दी गयी। 27 फरवरी 1931 के दिन था। भगत सिंह की गिरफ्तारी के बाद अब उन्हें फांसी दिए जाने की तैयारियों से चंदशेखर आजाद बहुत ज्यादा परेशान थे। वह जेल तोड़कर भगत सिंह को छुड़ाने की योजना बना चुके थे, लेकिन भगत सिंह जेल से इस तरह बाहर निकलने को तैयार नहीं थे। परेशान चंदशेखर आजाद हर तरह से भगत की फांसी रोकने का प्रयास कर रहे थे। आजाद अपने साथी सुखदेव आदि के साथ आनंद भवन के नजदीक अल्फ्रेड पार्क में बैठे थे। वहां वह आगामी योजनाओं के विषय पर विचार-विमर्श कर ही रहे थे कि आजाद के अल्फ्रेड पार्क में होने की सूच OKना अंग्रेजों को किसी तरह पता लग गयी। अंग्रेजों ने क्रांतिकारियों को घेर लिया। अंग्रेजों की कई टुकड़ियों द्वारा पार्क को अंदर-बाहर से घेर लिया गया। उस समय किसी का भी पार्क से बचकर निकल पाना मुश्किल था, लेकिन आजाद यूं ही आजाद नहीं बन गए थे। अपनी पिस्टल के दम पर उन्होंने पहले अपने साथियों को पेड़ों की आड़ से बाहर निकाला और खुद अंग्रेजों से अकेले ही भिड़ गए। हाथ में मौजूद पिस्टल और उसमें रही 8 गोलियां खत्म हो गई। आजाद ने अपने पास रखी 8 गोलियों की दूसरी मैगजीन फिर से पिस्टल में लोड कर ली और रुक रुक कर अंग्रेजों को मुंहतोड़ जवाब देते रहे।
चंद्रशेखर आजाद ने जितनी भी गोलियां चलाई हर बार अचूक निशाने पर लगी और कोई न कोई वर्दीधारी मारा गया। दहशत के कारण अंग्रेज भी पेड़ों की आड़ में छुप चुके थे। एक अकेले क्रांतिकारी के सामने सैकड़ों अंग्रेज सिपाहियों की टोली बौनी साबित हो रही थी। चंदशेखर आजाद ने 15 वर्दीधारियों को अपना निशाना बना लिया था, लेकिन अब उनकी गोलियां खत्म होने वाली थी। चंदशेखर आजाद ने अपनी पिस्टल चेक की तो अब सिर्फ एक गोली बची हुई थी। वह चाहते तो एक और अंग्रेज अधिकारी को गोली मार सकते थे, लेकिन उन्होंने कसम खाई थी कि जीते जी उन्हें कोई भी अंग्रेज हाथ नहीं लगा सकेगा। इस कसम को पूरी करने के लिए आखिरकार उस महान योद्धा ने वह फैसला लिया जिससे वह हमेशा के लिए आजाद हो गए। आखिर में उन्हेांने अपना नारा आजाद हैं, आजाद रहेंगे अर्थात् न कभी पकड़े जाएंगे और न ब्रिटिश सरकार उन्हें फांसी दे सकेगी को याद किया और 27 फरवरी 1931 का वह दिन आजाद के लिये अंतिम दिन बन गया। चन्द्रशेखर आजाद पिस्टल की आखिरी गोली अपनी कनपटी पर चला कर हमेशा के लिए आजाद हो गए।
आजाद की ओर से गोलियां चलनी बंद हुई और लगभग आधे घंटे तक जब एक भी गोली नहीं चली तो अंग्रेज सिपाही धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे, लेकिन आजाद का खौफ इस तरह था कि एक एक कदम आगे बढ़ाने वाले सिपाही जमीन पर रेंगते हुए अब आजाद की ओर बढ़ रहे थे । आजाद के मृत शरीर पर जब अंग्रेजों की नजर पड़ी तो उन्होंने राहत की सांस ली , लेकिन अंग्रेजो के अंदर चंद्रशेखर आजाद का भय इतना था कि किसी को भी उनके मृत शरीर के पास जाने तक की हिम्मत नहीं थी। उनके मृत शरीर पर भी गोलियाँ चलाई गयी और जब अंग्रेज आश्वस्त हुये तब आजाद की मृत्यु की पुष्टि हुई।
भारत माँ के इस सपूत को हमारा शत-शत नमन!
दुश्मन की गोलियों का हम सामना करेंगे, आजाद ही रहे हैं, आजाद ही रहेंगे'- चन्द्रशेेेखर आजाद
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𝑉𝑒𝑟𝑦 𝑔𝑜𝑜𝑑 𝑚𝑒𝑚 𝑒𝑠𝑒 ℎ𝑖 ℎ𝑢𝑚𝑘𝑜 ℎ𝑚𝑎𝑟𝑖 𝑠𝑎𝑛𝑠𝑘𝑟𝑡𝑖 𝑎𝑢𝑟 𝑑𝑒𝑠ℎ 𝑝𝑟𝑒𝑚 𝑠𝑒 𝑟𝑢 𝑏 𝑟𝑢 𝑘𝑟𝑣𝑎𝑡𝑒 𝑟ℎ𝑒 𝑡ℎ𝑎𝑛𝑘𝑠 𝑚𝑒𝑚
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